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क्या है भगवान् शिव के त्रिशूल, डमरू और गले में लिपटे सांप का रहस्‍य?

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भगवान शिव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छवी उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की है. इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सांप की माला, सिर पर त्रिपुण्ड चंदन लगा हुआ है. कहने का मतलब है कि शिव साथ ये कुछ चीजें हमेश जुड़ी हुई हैं. आप दुनिया में कहीं भी चले जाये आपको शिवालय में शिव के साथ ये कुछ चीजें जरुर दिखेगी. क्या ये सभी शिव के साथ ही प्रकट हुए थे या फिर कुछ और कारणों से यह शिव से जुड़ते गए. शिव के साथ इनका क्या संबंध है और यह शिव जी से कैसे जुड़ी?

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क्यूँ है भगवान् शिव के गले में नाग?
भगवान शिव के साथ हमेशा नाग होता है. इनका नाम वासुकी है. इनके बारे में पुराणों में बताया गया है कि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका ही राज चलता है. सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम किया था. इन्ही के दवारा सागर को मथा गया था. कहते हैं कि वासुकी नाग शिव के परम भक्त थे. इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना दिया और साथ ही अपने गले में आभूषण की तरह लपेटे रहने का वरदान दिया था.

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क्यूँ है भगवान् शिव के हाथों में त्रिशूल?
भगवान शिव सभी प्रकार के अस्‍त्र-शस्‍त्रों के ज्ञाता हैं लेकिन पौराणिक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्‍त्रों का जिक्र आता है. एक धनुष और दूसरा त्रिसूल. भगवान शिव के धनुष के बारे में तो यह कथा है की इसका अविष्कार स्वयं शिव जी ने किया था. लेकिन त्रिशूल कैसे इनके पास आया इस विषय में कोई कथा नहीं है. माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब शिव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए थे. यही तीनों गुण को शिव जी के तीन शूल मतलब त्रिसूल बने. इनके बीच ताल बनाए बगैर सृष्टि का संचालन कठिन था. इसलिए शिव ने त्रिशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण कर लिया था.

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क्यूँ है भगवान् शिव के हाथों में डमरू?
भगवान् शिव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही मजेदार है. सृष्टि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में धवनि को जन्म दिया. लेकिन यह धवनि सुर और संगीत वाहिनी थी. उस समय भगवान शिव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस धवनि से व्याकरण और संगीत के ताल का जन्म हुआ. डमरू ब्रह्मदेव का स्वरूप है जो दूर से विस्तृत नजर आता है लेकिन जैसे-जैसे ब्रह्मदेव के करीब पहुंचते हैं वह संकुचित होकर दूसरे सिर से मिल जाता है और फिर विशालता की ओर बढ़ता है. सृष्टि में संतुलन के लिए इसे भी भगवान शिव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे.

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